महुआ बचाओ अभियान के नाम पर करोड़ों का घोटाला, कांग्रेस ने की उच्च स्तरीय जांच की मांग। मनेंद्रगढ़ वनमंडलाधिकारी पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप
महुआ बचाओ अभियान के नाम पर करोड़ों रुपये के घोटाले का सनसनीखेज खुलासा हुआ है। जिला कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता सौरव मिश्रा ने वनमंडलाधिकारी (DFO) पर बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगाते हुए मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को पत्र लिखकर तत्काल जांच की मांग की है।


राजन सिंह चौहान
मनेंद्रगढ़। सौरभ मिश्रा ने अपने पत्र में स्पष्ट कहा कि 21 एवं 25 अगस्त को प्रकाशित समाचारों के आधार पर यह घोटाला उजागर हुआ है, जिसमें मनेंद्रगढ़ वनमंडल ने “महुआ बचाओ अभियान” की आड़ में करोड़ों रुपये का बंदरबांट कर दिया। प्राप्त जानकारी के अनुसार मनेंद्रगढ़ के 63 वन प्रबंधन समितियों के खातों में ₹3.29 करोड़ की राशि जमा की गई थी, लेकिन प्राक्कलन तैयार कर ₹2.65 करोड़ खर्च दिखा दिया गया। हैरानी की बात यह है कि जमीनी स्तर पर इन समितियों में काम का कोई ठोस सबूत तक मौजूद नहीं है।
कई समितियों में कार्य पूरी तरह नदारद है, लेकिन फर्जी कागजातों और भारी-भरकम खर्च का हिसाब किताब बना दिया गया है। कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि यह पूरा प्रकरण योजनाबद्ध तरीके से की गई वित्तीय हेराफेरी और भ्रष्टाचार का ज्वलंत उदाहरण है।
सौरव मिश्रा ने मुख्यमंत्री को भेजे पत्र में मांग की है कि इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए। प्रत्येक समिति की जमा राशि, प्राक्कलन और वास्तविक कार्यों का ऑडिट एवं साइट वेरिफिकेशन कराया जाए। साथ ही बिल-बाउचर और दस्तावेजों की गहन जांच आवश्यक है, ताकि यह साफ हो सके कि फर्जी दस्तावेजों के जरिए सरकारी खजाने को तो नहीं लूटा गया।
मिश्रा ने यह भी कहा कि वनमंडलाधिकारी मनीष कश्यप की भूमिका बेहद संदिग्ध है और यह पूरा घोटाला उनकी संरक्षण में हुआ प्रतीत होता है। दोषी पाए जाने पर संबंधित अधिकारियों व जिम्मेदार व्यक्तियों पर कड़ी विभागीय और दंडात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस घोटाले की निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो यह साबित हो जाएगा कि सरकार भ्रष्टाचारियों को संरक्षण दे रही है। भविष्य में ऐसी योजनाओं में पारदर्शिता और सार्वजनिक लेखा-जोखा अनिवार्य किया जाना चाहिए, अन्यथा जनहित की योजनाएं महज भ्रष्टाचार का अड्डा बनकर रह जाएंगी।
(वन प्रबंधन समिति क्या है?)
वन प्रबंधन समिति (वन मंडल समिति) ग्रामीण और वन क्षेत्र के लोगों की वह संस्था है, जिसे सरकार द्वारा स्थानीय स्तर पर गठित किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य होता है –
जंगलों का संरक्षण और प्रबंधन – यह समितियाँ संयुक्त वन प्रबंधन (Joint Forest Management – JFM) के तहत काम करती हैं।
समिति का गठन कैसे होता है? – हर ग्राम पंचायत या गाँव के स्तर पर वन विभाग की देखरेख में एक समिति बनाई जाती है। इसमें गाँव के चुने हुए प्रतिनिधि, महिला सदस्य, अनुसूचित जाति/जनजाति वर्ग के लोग और वन विभाग के अधिकारी शामिल होते हैं। समिति का अध्यक्ष आमतौर पर गाँव का ही कोई जिम्मेदार व्यक्ति होता है।
समिति के मुख्य कार्य –
1. जंगलों की सुरक्षा – अवैध कटाई, आगजनी और चोरी से बचाना।
2. वृक्षारोपण और संरक्षण – पौधारोपण कर उन्हें सुरक्षित रखना।
3. वन उत्पादों का प्रबंधन – महुआ, तेंदूपत्ता, चार, लाख, शहद जैसे लघु वनोपज का संग्रह और विपणन।
4. सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन – जैसे “महुआ बचाओ अभियान”, “हरित छत्तीसगढ़ अभियान”, ट्री गार्ड वितरण आदि।
5. लेखा-जोखा और फंड प्रबंधन – समितियों को जो राशि मिलती है, उसका सही उपयोग और खर्च का हिसाब रखना।
फंड और वित्तीय व्यवस्था
सरकार या वन विभाग से योजनाओं के लिए फंड सीधे समिति के बैंक खाते में जमा होता है।
समिति उस फंड का उपयोग कार्यों जैसे – पौधारोपण, ट्री गार्ड खरीदी, मजदूरी भुगतान आदि में करती है।
हर खर्च का बिल-बाउचर और प्राक्कलन (Estimation) बनाया जाता है।
सिद्धांत रूप से इसकी ऑडिट और सोशल वेरिफिकेशन ज़रूरी है, ताकि गड़बड़ी न हो।
क्यों विवादों में रहती हैं
समितियाँ?
कई बार समितियों के खातों में करोड़ों रुपये आते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर काम बहुत कम होता है।
कागजों पर बिल-बाउचर बनाकर खर्च दिखा दिया जाता है, जबकि असल में कार्य अधूरा या नदारद रहता है।
स्थानीय स्तर पर पारदर्शिता न होने और वन विभाग की ढिलाई के कारण अक्सर भ्रष्टाचार और घोटाले सामने आते हैं। 




